बिन देखे क्या कहे ,
बिन जाने क्या लिखे ...
कुछ तुम कहो ,
कुछ हम कहे ,
आओ एक दूजे को जान ले ...
जिन्दगी की इस दोड़ में ,
आगे बढने की होड़ में ,
कुछ अपने पीछे छुट गए,
कुछ रिश्ते भी टूट गए ...
मिलना अपना मुमकिन नहीं,
फिर भी अगर मिल जाए कहीं ...
शब्दों की बिना पर,
एक दूजे को पहचान ले ....
कुछ तुम कहो,
कुछ हम कहे,
आओ एक दूजे को जान ले ......
Book Review: Ja se Jail: जेल की मिट्टी असंभव को भी संभव कर सकती है
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*"जेल की मिट्टी में वो ताक़त है कि वह असंभव को भी संभव कर सकती है, इंसान
में 'जज़्बा' होना चाहिए।" रामधनी द्विवेदी *
उपन्यास - ‘ ज से जेल’
लेखिका – वर...
2 हफ़्ते पहले
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